(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

Aadiparv (Mahabharat) - आदिपर्व (महाभारत)


॥ श्रीः ॥
1.44. अध्यायः 044
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Topics
परीक्षिन्मरणोत्तरं तत्पुत्रस्य जनमेजयस्य राज्याभिषेकः॥ 1 ॥ वपुष्टमाविवाहः॥ 2 ॥
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Text

सौतिरुवाच। 1-44-0x(216)(1930)
तं तथा मन्त्रिणो दृष्ट्वा भोगेन परिवेष्टितम्।
विषण्णवदनाः सर्वे रुरुदुर्भृशदुःखिताः॥ 1-44-1(1931)
तं तु नागं ततो दृष्ट्वा मन्त्रिणस्ते प्रदुद्रुवुः।
अपश्यन्त तथा यान्तमाकाशे नागमद्भुतम्॥ 1-44-2(1932)
सीमन्तमिव कुर्वाणं नभसः पद्मवर्चसम्।
तक्षकं पन्नगश्रेष्ठं भृशं शोकपरायणाः॥ 1-44-3(1933)
ततस्तु ते तद्गृहमग्निना वृतं
प्रदीप्यमानं विषजेन भोगिनः।
भयात्परित्यज्य दिशः प्रपेदिरे
पपात तच्चाशनिताडितं यथा॥ 1-44-4(1934)
ततो नृपे तक्षकतेजसाहते
प्रयुज्य सर्वाः परलोकसत्क्रियाः।
शुचिर्दिजो राजपुरोहितस्तदा
तथैव ते तस्य नृपस्य मन्त्रिणः॥ 1-44-5(1935)
नृपं शिशुं तस्य सुतं प्रचक्रिरे
समेत्य सर्वे पुरवासिनो जनाः।
नृपं यमाहुस्तममित्रघातिनं
कुरुप्रवीरं जनमेजयं जनाः॥ 1-44-6(1936)
स बाल एवार्यमतिर्नृपोत्तमः
सहैव तैर्मन्त्रिपुरोहितैस्तदा।
शशास राज्यं कुरुपुंगवाग्रजो
यथाऽस्य वीरः प्रपितामहस्तथा॥ 1-44-7(1937)
ततस्तु राजानममित्रतापनं
समीक्ष्य ते तस्य नृपस्य मन्त्रिणः।
सुवर्णवर्माणमुपेत्य काशिप
वपुष्टमार्थं वरयांप्रचक्रमुः॥ 1-44-8(1938)
ततः स राजा प्रददौ वपुष्टमां
कुरुप्रवीराय परीक्ष्य धर्मतः।
स चापि तां प्राप्य मुदा युतोऽभव-
न्न चान्यनारीषु मनो दधे क्वचित्॥ 1-44-9(1939)
सरःसु फुल्लेषु वनेषु चैव
प्रसन्नचेता विजहार वीर्यवान्।
तथा स राजन्यवरो विजह्रिवान्
यथोर्वशीं प्राप्य पुरा पुरूरवाः॥ 1-44-10(1940)
वपुष्टमा चापि वरं पतिव्रता
प्रतीतरूपा समवाप्य भूपतिम्।
भावेन रामा रमयांबभूव तं
विहारकालेष्ववरोधसुन्दरी॥ ॥ 1-44-11(1941)

इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः॥ 44 ॥

Mahabharata - Adi Parva - Chapter Footnotes
1-44-2 दह्यमानं ततो दृष्ट्वा इति पाठान्तरम्॥ 1-44-7 प्रपितामहो युधिष्ठिरः॥ 1-44-8 वपुष्टमा काशिराजकन्या॥ 1-44-11 वरं वरणीयम्। प्रतीतरूपा हृष्टरूपा॥ चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः॥ 44 ॥


Mahabharat- Hindi (Devanagari) 100000 shlokas

www.sanatanadharm.com - play store app (sanatana dharm)

"Bharathiya Sanatana Dharm" and Sanatana Dharmam & Dharmo rakshati Rakshitha logo are our trademarks. Unauthorised use of "Sanatana Dharmam & Dharmo rakshoati Rakshitha" and the logo is not allowed. Copyright © sanatanadharm.com All Rights Reserved . Made in India.